Tuesday, April 19, 2011

मन

पावस की तपती दुपहरी में


आँखें खुली तो पाया खुद को


खुद में पाया अकेला -


नितांत अकेला ।


ठन्डे पानी की आस में,


तपती दुपहरी में


अमलतास की ठंडी छाँह की आस में


हलक सूखता, बदन टूटता, देह निढाल।


मन थका सा -


कातर पंछी की तरह


तेज़ रफ़्तार में दौड़ता ।


मन-


कितना अजीब है इसका अस्तित्व


जो चाहता है वह करवाता है


जो सोचता है वह होने पर मजबूर करता है


उस दिन,


तपती धुप में तपते तन पर


एक बार फिर मन का पहरा था


न जाने क्यूँ क्या सोचकर


मन में कई बातों का, कई भावनाओं का


घना कुहरा था।


विचलित मन -


परेशान , निरंतर हैरान


मन-स्वयं मेरा ही तो था।


अचानक प्यास बुझ गई।


छांह की आस तृप्त हो गई।


मन की गाछ हरी हो गई।


शायद इसलिए की अनुभव हुआ


मन का अस्तित्व शाश्वत नहीं


मन का वजूद सही मायने में


कोई वजूद है ही नहीं।




शाम और धूप

नीले आसमान के मैंने देखा


नीम के पत्तों को हटाते


अपनी कल्पनाशील आँखों के सामने से


पत्तों के कलेवर को झकझोर कर हटाते।



मैंने देखा- तेज़ चुबती किरणें


सूरज की चिलचिलाती किरणें ,


पत्तों से छन कर छल्ले बनाती किरणें


जमीन पर पत्तों की छाया गढ़ती किरणें ,


दिन के ढलते सिमट जाती हैं-


दुबक कर आँखें मीच लेती हैं।



धीरे धीरे शाम की सिंदूरी लालिमा


धूसरित होती


काली स्याही का दुपट्टा ओढ़े


अपने साथ उस छाया को भी


तारों की टिमटिमाती हस्ती में


विलीन कर देती है।


बूंदें

हरे पत्तों से छान कर गिरती बूंदें


आकाश से सीधे ज़मीन पर गिरती बूंदें


तनों के तन से सरककर फिसलती बूंदें


आखिर, विलीन हो जाती है।



विलीन हो जाती हैं


छोटे छोटे गड्ढों में


घुल मिल जाती हैं


नदियों की कल कल में


बह कर मचल जाती हैं


समुन्दर की लहरों में ।



आखिर विलीन हो जाती हैं बूंदें-


ऐसी गुम होती हैं की


जमीन की सोंधी गंध


आकाश की स्वछन्द महक


पत्तों की हरी खुशबू


सब कुछ



समुन्दर के खारे पानी में


सागर को और भी नमकीन


और भी ग़मगीन बना कर


अपना अहम्, अपना स्वयं


अपना "मैं"


समुद्र की अटल गहराइयों में


समा देती हैं।


अपना अस्तित्व


सार्थक कर जाती हैं.




Monday, April 18, 2011

मैं

मैं हूँ कौन किसी के लिए?



काफिले के साथ चलती एक गुमनाम मुसाफिर



कई संदेशों के बीच एक छोटी सी पंक्ति



तल्ख़ भीड़ के दरमयां एक और चेहरा



बस अभी ही



आँखों के सामने से गुजरी अनगिनत में से एक तस्वीर





मैं आखिर हूँ कौन किसी के लिए?



वक़्त और तमन्ना के बीच पसरी एक फालतू अड़चन



रात और दिन के बीच बिखरा एक निरर्थक सन्नाटा



कल्पना और सृजन के मध्य फंसा एक अप्रत्याशित अंतराल



कर्तव्य और कर्म के दरमयां लटकती एक अनापेक्षित फाँस





बिना जाने, बिना देखे



बिना परखे, बिना पहचाने



बिना सुने, बिना कहे-



फटकार दो मुझे



और मेरे साथ लिपटे



तमाम प्रश्नों को



मेरे सवालिया जज्बात को



मेरी भेदती आवाज़ को


क्योंकि मेरी तरह



कितने गुमनाम चेहरों की शिनाख्त करोगे?



कितनी अड़चनो को पार करोगे?



कितने सन्नाटों में आवाज़ ढूंढ पाओगे ?



कितने सवालों का जवाब दोगे?





मैं आखिर हूँ कौन किसी से सवाल पूछने के लिए?



मुझे दर है की कहीं



मेरी अस्तित्व विहीन पहचान की



तफ्सीलात और शिनाख्त के बीच



एक सुर्ख निगाह,



खुबसूरत तसवीर,



बोलता सन्नाटा,



गुजरता मुसाफिर,



प्रस्फुटित पंक्ति,



अर्थपूर्ण अंतराल



तुम्हे छू कर गुजर जाए



और तुम एक बार फिर



देख कर अनदेखा और



सुन कर अनसुना कर दो।

















Friday, April 15, 2011

खाली अधूरे पन्ने पर कुछ शब्द लिखे थे मैंने-
तुम्हारे जाने के बाद।
अभी तक दीवारों पे लगे
मकड़ी के जालों को हटाया नहीं,
कोने में जमी धूल साफ़ तक नहीं की।
बहुत समझाया खुद को
कि दुबारा समेट लूँ
बिखरे उन लम्हों को-
तुम्हारे जाने के बाद ।

पर अब जा कर समझी हूँ कहीं
कि जाने के बाद लौट कर कोई आता नहीं।
तो धूप को आँचल पे,
धूल को तन पे,
शब्दों को मन में
दफ़न कर रखने कि ख्वाहिश
खुद को बहलाने का धोखा है।

और ठगना तुमने सिखलाया नहीं
सीख भी तो नहीं पाई-
तुम्हारे जाने के बाद।

कमरा और मैं

कोने में दुबकी सुबह की धूप ने
जब अंगड़ाई ली
तो कमरे में बेतरतीब फ़ैल गई।
उदास सी ठहरी बासी हवा में
एक उबासी भरी बात घोल गई ।

इन दीवारों से मैंने पूछा -
आज अगर इस धूप के नाम कुछ संदेस देना हो तो क्या दोगे?
उसने मुस्कुराकर अपने सीने से लगी खिडकियों को खोला
और कहा-
बस इसी तरह
हर सुबह
वो चुपके से मेरी पीठ से लिपट जाया करे
इस कमरे कि उबासी में
धुली धूप घोल जाया करे।
मैंने आश्चर्य से अपनी आँखें फैलाईं
कहा-
क्या बस इतनी सी संवेदना काफी है?
दीवार दुबारा मुस्काई
उसने सलीके से अपने कोने कि धूल झारी
और स्फुट स्वर में बोली-
यही काफी है इस घर का
और घर के बाहर का
अँधेरा दूर भगाने के लिए।
और इससे ज्यादा की उम्मीद
धूप से करना
नाइंसाफी है ।

मैंने खिड़की से बाहर झाँका ।
बाहर हरी मखमली घास पर,
इस ओर से उस ओर ,
क्षितिज के विस्तार तक
हरी पीली सुबह
जीजिविषा कि ओस में नहाये
अपने दांत फैलाये
चहुँ ओर मुस्कुरा रही थी।

ठूंठ

उस ठूंठ को देखा है मैंने कई बार
इसी तरह
कड़ी धूप में, बर्फीली सर्दी में
बस ऐसे ही खड़े-
निर्विकार, निर्लिप्त।

इस पेड़ की टूट गई हैं सारी पत्तियां
ठूंठ हो गई हैं सारी टहनियां
झर गई है कोपलें
तिक्त हो गया है सारा सौंदर्य।

फिर भी शायद
अपनी जड़ों को धरती में संजोये
उनमे थोड़ी बहुत,
टूटी फूटी जीजिविषा बचाए
इस धूप में खड़ा है वो पेड़।