Saturday, October 13, 2012

Magazined emotions...

And the blood gushed hot and free
just as the cheap whisky flowed out of his  
inebriated tongue..
slithering and wriggling in her mouth.....


        Dry thoughts in her desiccated brains
        dried by the chopped seas
        of the nocturnal slaugther
        finished she was in one draught.....

And an old bitch dies a bitchy death.
Festering wounds in a stinking alley
the drains of life empty.

         Flies debate Darwin on her corpse
         the infant bloody and dry
         a faint muffled cry....

Another life gutting in death..

Tuesday, October 9, 2012

Bloody love in gory times....

And kissing you into place 
shoving you against the car...
I left.


 With myself i carried you
 in every breath of that peppermint floss
 in every burp of that half eaten pizza
 the half drunk beer...

Murdered roads lay ahead us
ravenous rebellion
crazy night falls again
ideas shiver in disgust...

You are cold under the naked sky
the grass on the earth against your skin.
I know they killed you
and with that our story...

I shoot
keep shooting
shall keep coming back
to kiss you in place again....

Let the night sustain...
let the blood on you remain. 

Sunday, September 30, 2012

Insipid inspiration...


Abandoned -
in the alcove
that christened us,
a thousand dreams lay strewn.

Two searching eyes,
just like that,
on the pilaster of the walls
just created.

Destitute tears
sink back.
Into the hollow reception
of echoes and recesses.

The hearth
runs out of wood
or is it fire?

Long wait
longer longings
Chilling even the furniture
you just rearranged.



Monday, August 27, 2012

संस्कृति और श्रिंगार


बस एक बार ही हाथ फेरा था मैंने
बिस्तर की सारी सिलवटें खो गईं
उस रात के सारे प्रमाण खो गए
कैसे जोड़ोगे टूटे लम्हों को अब
मेरे जाने के बाद.

यह ज़रूरी तो नहीं
की इतिहास के मार्फ़त ही जिया जाये
और वो भी तब जब नित प्रतिदिन, हर रोज़
नवीनता की परिभाषा भी बदल जाती है

कब तक बासी कमरे की बू को झेलेंगे?
कब तक एक दूसरे के साथ
सड़ांध , मदांध और कैशोर्य तिल तिल कर
घुटते, टूटते देखेंगे?

काफी ठंडी, तरावट वाली हवा है
संस्कृति के इस रोमानी शाम की
बाहर रेतीला रेगिस्तान है
सूरज कब का ढल चुका है
झुलसा दिन ठहरते ठहरते
ठंडा हो चुका है

खिड़की खोल दो
थोड़ी ताज़ी हवा आने दो.

Installed desires - Part 10

शाम की गुनगुनाती सी तन्हाई. और तुम ठीक वैसे ही याद आये जैसे तुम मेरी ज़िन्दगी में आये - अचानक, एकदम से.

रित्विका ने अपने आंसुओं को रोकने की भरसक कोशिश की. उसने सबकी सहमति में खुद की सहमति को आरोपित कर दिया था. धृतिमान को हाँ कह दिया था. किस लिए हाँ कहा था - यह तय कर पाना मुश्किल था. हाँ स्वीकारना भी होता है, समर्पण भी, समझौता भी, सुलह भी, समाधान भी. कई बार मौन विद्रोह भी होता है एक बार बस हाँ कह देना.

धृतिमान ने बड़ा अचकचाया सा प्रश्न पूछा था. "क्या तुम मुझे खुद को सौपने दोगी? मैं तुममें खुद को तलाशना चाहता हूँ. एक तलाश भर की ही चाह है. स्वीकारोगी मेरी तलाश को?"

प्रत्याशित यह था कि वो पूछे, "क्या तुम मुझे अपनाओगी? क्या तुम खुद को सौपोगी? मैं पाना चाहता हूँ तुममें अपने आप को."

तब शायद आसान होता उसके लिए. एक असमंजस सा भाव उमड़ आया था रित्विका के चेहरे पर. सहम सी गई थी वो. पता नहीं क्यों एक ही झटके में सब कुछ टूटता सा, टूट कर बनता सा नज़र आ रहा था उसे. वह निर्णीत नहीं कर पा रही थी खुद को. यहाँ जिम्मेवारी थी. पहली बार प्रेम की स्वतंत्रता को छीनती, प्रेम में बंधने वाली आजादी थी. पता नहीं वो तैयार हो भी पाई थी या नहीं. और इसी ऊहापोह में, शाम की उस पारिवारिक पार्टी के एक ज़हीन से कोने में जब चुपके से धृतिमान ने उसे वाईन थमाते हुए पूछा था, तब स्तब्ध रह गई थी वो.

रित्विका ने गौर से धृतिमान की आँखों में देखा. कोशिश की कि पढ़ पाए कि उन में क्या कुछ समेटा, उनसे क्या कुछ बिखेरा जा रहा रहा है. प्रेम का जो स्वरुप उसने विहंस में, विहंस के लिए देखा था उसमें और इसमें वो उलझ कर रह गई थी. शायद अपनी अपूर्णता को विधिसम्मत करने का जरिया था विहंस के साथ उसका रिश्ता. उसमें अपेक्षा थी, इसलिए आंसू थे, हैं भी. उसमें टूटने की चाह थी. समेटा सब कुछ बिखेरने की तलब की. अपने स्वत्व, अपने अपनत्व, अपने सारांश को एक धुरी पर केन्द्रित करने की चिर संचित अभिलाषा थी. कुल मिला कर एक पारस्परिक अन्योन्यता थी.

इस अंतराल में धृतिमान ने रित्विका को जिस तरह चूमा था, उसमें चाह कम, समर्पण ज्यादा था. उसमें एक निराश सी, मायूस सी आकांक्षा थी कुछ ढूँढने की, कुछ ढूंढती सी. ऐसा लग रहा था मानो सब कुछ भूल कर एक रिश्ता बनाना चाहता था वो. रित्विका के मन में अजीब सी उधेड़बुन थी. एक तरफ उसकी चाहत थी और एक तरफ उसकी चाह. दोनों के परस्पर द्वंद्व से उत्पन्न इस स्तिथि में उसने धृतिमान के आलिंगन में स्वयं को डूबते देखा. पता नहीं वह स्पर्श आश्रय ढूंढ रहा था या तलाश. ठहराव चाहता था या नई खोज. इन प्रश्नों को वक़्त के हवाले करते हुए रित्विका ने धृतिमान का हाथ पकड़ लिया और धृतिमान ने हलके से रित्विका के बालों को सहलाते हुए कहा, "पार्टी ख़त्म होने तक बात आज बात लोगों तक पहुंचानी है."

रित्विका की आखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. शायद वाइन का खुमार था, शायद पहली बार किसी की तरफ जिम्मेवारी का एहसास था. शायद पहली बार एक बंधन में स्वतंत्र होने का निवेदन था. शायद एक बार प्यार करने की नहीं बल्कि प्यार पाने में सुख ढूँढने का निर्णय था. शायद एक बार फिर कुछ खोने, कुछ पाने का एहसास था. जो भी था, अभी इस वक़्त धृतिमान के कंधे पे रखा सर, आँखों से बहते आंसू और उन दो आँखों का स्नेहिल, मादक स्पर्श उसे बार बार बिखरने को उकसा रहा था. रित्विका ने कांपती आवाज़ से, हलके से 'हाँ' कहा. और फिर मानो यथार्थ ही बदल गया.

Thursday, June 21, 2012

उदास सी खुशबू

एक उदास  सी खुशबू ने आज अनायास  ही झकझोर दिया. आज की बेशर्म सुबह भी कल जैसी ही थी, परसों जैसी ही. कुछ भी तो नया नहीं था. लेकिन उस बासी हो चुकी खुशबू ने पुराने अरमानों में मानो आग लगा दी.

सुबह की ओस अभी गीली ही थी. भीनी भीनी सी धूप हौले हौले - दूब से, पत्तों से - ओस को चाटती पसरती जा रही थी. अपनी ही दुनिया में मस्त मेरी महत्वाकांक्षाएं, मैं खुद, बस खानापूर्ति के लिए नंगे पाँव घास पे टहल रही थी. तभी वह उजास सी खुशबू, कुछ उदास सी खुशबू मुझे हलके से छू गई. मुझे पता चला भी. यही तो दुःख का कारण है. 

वैसी ही खुशबू कल तक अपने गाँव में हुआ करती थी. मिट्टी की, गोबर से लीपे गए आँगन की, गरम चूल्हे पर डाले गए पानी के बूंदों की - ठीक वैसी ही खुशबू. हो सकता है बारिश हुई हो. या हो सकता है बारिश होने वाली हो. कौन जाने कहाँ से प्रेरित होकर आई यह खुशबू.

लेकिन इस पार्क में इतनी सुबह इस खुशबू का औचित्य समझ नहीं आया. डियोद्रेंट की तेज़  महक से, पेट्रोल, डीज़ल  की तीखी गंध से छिपती-छिपती, बचती-बचाती ये खुशबू न जाने कैसे एक बार तैर गई?  या हो सकता है मेरे खोजी दिमाग ने अब अनायास आई चीज़ों को लेना ही बंद कर दिया है. हर वक़्त कारण-परिणाम सम्बन्ध खोज पाने की होड़. पर यह खुशबू थी बड़ी ज़बरदस्त. लेकिन उदास.

छोटी सी थी जब बाबा के कन्धों पर चिपटी, दादी के हाथों से दूध का चम्मच मुंह में उड़ेलती थी. थोड़ी बड़ी हुई तो चूल्हे के पास बैठकर गरम गरम रोटियों पर मक्खन लगा कर मिसरी और बादाम के साथ सुबह का नाश्ता करती थी. थोड़ी और बड़ी हुई तो अलसुबह उठकर उसी चूल्हे पर बाबा के लिए कड़क चाय बनाती थी.

अब सब ख़त्म हो गया है. महानगर के इस कॉन्क्रीट के जंगल में हरी घास बस सुन्दरता का प्रमाणपत्र भर लिए पार्क में फैली होती है. मिट्टी सिर्फ बालकनी के गमलों में एक-आध कैक्टस के पौधों को समेटने में लगी रहती है. मैं भी क्या कम हूँ? पता नहीं क्यों, बिना किसी बात के चूहे की दौड़ में शरीक वो सब भूल कर  न जाने क्या पाने में लगी हूँ?

यह बस कल्पना मात्र है. कहा न कल वाली ही सुबह है. कल वाली ही बात है. दिमागी फितूर है ये सब. जो लौट गया, जो बीत गया, वो आता थोड़े ही न है. यही समझती, खुद को नकारती, मैंने खुशबू को खुद में समेट लिया. ऐसा समेटा की अब बस उसकी उदासी भर ही बच पी है. नेपथ्य में सब ख़त्म हो जायेगा. सब कुछ. न रहूंगी मैं, न खुशबू....रह जाएगी बस एक उदासी...एक रिरियाती सी कामना. 

Friday, June 8, 2012

Installed Desires - Part 9

धौंकनी सी धूप बेतरतीब फ़ैल चुकी थी. छत पर अजीब सी शांति पसरी थी. शायद मिथ्या के जाने के बाद की, अपनी नियति की स्वीकृति जैसी शांति. पिछले सात सालों का बोझ उतर कर नए रूप में हावी हो रहा था. कौशल समझ कर भी मानना नहीं चाह रहा था की मिथ्या जा चुकी है. शायद हमेशा के लिए.

उसने चिट्ठी खोली. उसके सिरहाने रखी थी. मोबाइल के नीचे. इस तरह से की उठते ही उस पर नज़र पड़े. और इस तरह भी की अनजाने में भी नींद के दौरान कहीं कागज मसल न जाये. लापरवाह सावधानी के साथ. वही सपाट से किन्तु रोचक शब्द. लेकिन इस बार उनमें तल्खी थोड़ी अधिक थी. या शायद आज कौशल को ऐसा लगा.

"तुम जरूर ग्यारह बजे के करीब जागोगे. कांता जब घर की सफाई कर ले, उसे पैसे दे देना. मैंने फ्रिज के ऊपर रख दिया है. दूध का पाकेट मंगवा दिया है. इस महीने बिजली का बिल मैंने जमा कर दिया है. केबल वाले को देने के लिए पैसे बचे नहीं थे. उसे दे देना. घर की चाबी भी फ्रिज के ऊपर है. तुम्हारी दवा ख़त्म हो गई थी. मैंने फ्रेश स्टॉक रख दिया है. तुम्हारी टेबल पर है. बिष्ट जी के घर जो शाम की पार्टी है उसके लिए गिफ्ट भी पैक करवा दिए थे. मेरे आलमारी में रखा है. आशा है कि कोई परेशानी छोड़ कर नहीं जा रही. अगर कुछ हो भी, तो संभाल लेना. अपना ख्याल रखना. कोशिश करना सिगरेट थोडा कम पियो. कम्पलीकेशंस बढ़ सकती हैं."

कौशल ने समय देखा ग्यारह बजकर पांच मिनट हो रहे थे. मिथ्या कि फ्लाईट जा चुकी थी. समय सात साल के इतिहास और वर्तमान में फैला गंभीर बैठा था. कौशल ने सिगरेट सुलगाई और छत पर जा बैठा. एक अजीब सी मुस्कराहट तैर रही थी चेहरे पर. वह खुश था या नहीं यह समझ ही नहीं पा रहा था. शायद पिछले कुछ सालों में संवेदना का कोई स्वर उसके अन्दर फूटता ही नहीं था. "बेस्ट बिज़नसमन ऑफ़ द इयर" के ख़िताब को लेने समय जो भावहीनता उसके चेहरे पर थी, वही भावहीनता तब भी थी जब मिथ्या ने वकील से तलाक कि बात की थी. कुल मिला कर कोई भी घटना उसे अब उद्वेलित नहीं करती.

उसने ऑफिस फोन किया. सेक्रेटरी को कह दिया कि घर पर ही फाइल्स भेज दे. खाना आर्डर करवा लिया.

बाथरूम में जाते ही उसने महसूस किया कि जितनी जतन से सफाई कि गई थी कि मिथ्या का एक भी अंश, उसके यहाँ सात साल रहने के प्रमाण लगभग हर कोने से मिट चुके थे. न आईने पर उसकी बिंदी के निशान थे, न उसके साबुन, शेम्पू, परफ्यूम कि कोई भी महक, कोई भी बूँद. एक बार फिर एक हलकी सी मुस्कराहट तैर आई. चेतन मन से की जाने वाले ये तमाम कोशिशें एक बेहद भौंडे रूप से अतीत को परोसती हैं. बहरहाल, स्तिथि यह कि मिथ्या जा चुकी है.

कौशल ने चिट्ठी में लिखी बातों के अनुसार सारे काम किये. दवाइयों को सहेज कर बेड के पास रख लिया. चिट्ठी कूड़े वाले के डब्बे में डाल दी. अपने फोन का सिम बदल लिया. एक बार मन हुआ कि पूछ ले कि वह रित्विका के पास पहुँच गई है या नहीं. पर फिर एक सिगरेट जलाई और छत पर खड़ा हो गया.

सड़कें सुनसान थी. छत पर कपड़ों की तार ढीली होकर लटक रही थी. मन हुआ कि काट फेंके उसे भी. पर फिर....शायद यह एक अंतिम सा प्रमाण है उसके रहने का...फिर वही मुस्कराहट. कौशल सोच रहा था कि मन से कैसे निकाल दूँ ये सात साल? कैसे काट फेंकू वो सब कुछ जो जैसे भी रहे, थे. उनका अस्तित्व भी उतना ही सच है जितना कि यह कि मिथ्या और कौशल एक साथ रह नहीं सकते. और अब एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहते. एक शादी जो वक़्त के थपेड़ो के साथ सिर्फ एक साझापत्र मात्र बन कर रह गई थी. एक रिश्ता जो होकर भी नहीं था. कौशल ने आज की पांचवी सिगरेट सुलगाई.

उधर मिथ्या ने एअरपोर्ट पर उतरते ही कौशल के ऐशट्रे को कूड़ेदान में डाला. और आँखों में थिरक आये आंसुओं को झटकते हुए काले चश्मे को पहन लिया. आज से वो एक नयी शुरुआत करेगी. वैसे ही जैसे उसने एक बार कॉलेज के दिनों में अनुवंश के साथ सोचा था. आज वह आजाद थी. न कोई अनुवंश था, न कोई कौशल. न वाधवा खानदान कि बहू और न ही आहूजा खानदान की बेटी. वह मिथ्या थी. एक झूठा सा दिखता सच. एक सच सा दिखता झूठ.