Friday, September 17, 2010

rudan

शाम की सिंदूरी सी कालिमा
पर नए रंगों की परत
यों पुतती गई
मानो
कहीं किसी गाँव के
किसी छप्परनुमा झोपड़ी
के चार शहीद के
गुमनाम अक्सों के
खून से सनी
अबतक धूल-धूसरित हो चुके
सरकारी कागजों,
कानूनी दस्तावेजों
और कानूनी लबादों पर
दुबारा प्रशासनिक
स्याहियाँ पुतती जा रही हों।
रात गहराती जाती है
और उसी तरह गुम होता जाता है आकाश
घुप्प अँधेरे मैं।
वैसे ही यह खून
सूख कर चिपक चुका है
अबतक
कार्यालयी ज़ेहन में।
मिटता जा रहा है अस्तित्व
परत-दर-परत पुतती हुई
स्याहियों के इन्द्रधनुष में ।
क्या कहूँ इसे?
नव छंद?या
नया सवेरा?
या बासी पड़ी
एक सूखी सी रोटी
के लिए होती
ज़द्दोज़हद