Thursday, December 25, 2014

I want to be read - free

I want to emboss poetry on metro rails
one day 
on the swaying and swishing body of the train
ón the faded skin of DTC buses
on the muscles of corporate architectures
in malls
in parking lots
painting the city with poetry 


Delhi - where i lost myself and found again 


i want to write poetry deeply engraved into its skin 


Breathing the hot and cold of the weather 
surviving the scorching heat of politics 
and the vaporous cold of media
i want it to still survive
after freezing days of unsymapthy
after scalding days of vulgar show off 


I want poetry
to be free from the hassles of bespectacled editors
and branded publishers
and swanky cars driving B&B Sons and other publicity 'givers'


I want to write for myself
and you and us
and anyone that breathes 
and not depend on anyone
to be read to be publicized 


I want to write poetry on the mounds of dirt - everywhere
gushing off stench in Nehru Vihar
used, putrefying sanitary napkins
dogs and urchins debating Darwin
over half eaten pizza 


I want to write poetry on swanky cabinet meetings
'in glassrooms of corporate structures
on half burnt faces 
maimed limbs
mangled bodies
crushed dreams
brutally snatched livelihoods 


I want to write on Wazirabad and Gopalpur
and report how unannounced fire burnt illegal constructions
how carbon monoxide killed daily wagers
while they thought
they slept peacefully
in the winter night  


And be published and displayed at Race Course
the next station Jor bagh
many stations earlier
the Hauz Khas 'Village'


I want to write poetry on actual villages
on happiness there 
Not all vulgar and ugly
but sometimes beautiful when they really are. 


Looking for beauty in the metros
i look for poetry
on the otherwise blank
or badly done advertisements 
of a certain shrieking politician
claiming to clean Delhi

Tuesday, November 4, 2014

Rancid rant

And no i will not compromise!

Why should i?
Did i work less?
smile less?
report less?
write less?
perform less?
discuss less?
advise less?
manage less?

Yes i did not -
warm up to you 
snigger at lame jokes 
laugh at sexist jibes
tolerate idiocy and sycophancy 
passed counterfeit data 
blew up time for 'right' moments 
cosy up in corridor meetings 

And that is the precise reason, Mr. Asshole !
That i deserve all that you claim
appropriated by goddamn history!

And i will have it, my way - someday!

He is a poet

Because he can afford to - 

He writes poetry dipped in sensitive phrases 
laced with kind, soft musings about a female heart. 
The first kiss on her lips
the soft touch of her skin - for the first time. 

She is just his wife -
being made so the night before -
washing the stains of the bloodied sinful sheet furiously 
sobbing and crying and wetting her dishevelled hair.

He looks at her 
writes another verse 
of her pain 
the stab of his virility
taking away her innocence. 

She cries 
continues to cry. 

His verse unbale to reach her 
penetrates the world 
with amazing sensitivity. 

Brilliant the poet 
emerges on the canon

Rising above mounds of tears

Because he bloody could afford so! 

Am not writing...am ranting

Am not writing - 
creating a beautiful architecture 
measuring words in teaspoons of rhyme, rhythm, candor 
loading with intertextual metaphors in history and theory 

Am ranting. 

I don't have the luxury 
to weigh 
to balance 
to contemplate 
to think through. 

Poetry is not a hobby for me 
it's a reflex 
when one of you groped and fled 
whistled and sniggered 
catcalled and dragged 

Poetry is not a search for me
it's where i belong 
after each night of violation 
where i curl up in peace 
after draining my tears 

In tiara of words. 
Am not writing, am ranting. 

Wednesday, June 4, 2014

एक बार फिर....

मुझे लेफ्ट, राइट, लिबरल आदि इत्यादि की परिष्कृत भाषा 
कैंपस के उस कैफ़े तक समझ आती थी 
जहाँ न तो 7 वर्षीय छोटू गिलास में चाय परोसता घर संभालता था   
न ही मैली साड़ी में पगलिया अर्ध नग्न महाविद्यालय की सड़क पर
हंसती रोती बाल नोचती थी.

जिम और पार्लर जाकर नारीत्व खरीदी आयीं संभ्रांत नारियां
नारीवाद के नारे  को ब्लैक गोगल्स के साथ सर पे चढ़ाये
अमुक टीवी चैनल के अमुक स्लॉट में विछारधारा का संघर्ष छांटती
जब कुछ  चुनिंदा वाक्यों में चुप्पी ओढ़ लेती हैं तो
कैसे जस्टिफाई करूँ सारे वाद विवाद प्रतिवाद?
कैसे मान लूँ कि  कलम में ही क्रांति है?

लेफ्ट राइट लिबरल की पीत राजनीति के बीच बंटी
उस छद्म सर्वहारा के लिए छद्म पीड़ा और छद्म क्रान्ति
अचानक चुप, शांत, मौन, सन्नाटे में सनी -
मेरी समझ से परे, मेरे बुर्जुआ दिमाग के बाहर
मोम क्रांति से चिकनी सड़क पर  फिसलती जाती है.

शायद सही समय पर रानी, संगीता, लीला, कान्ति बलात्कृत नहीं  हुई
सही समय पर उन्होंने या उनमे से किसी एक ने मर्द ज़ात की मर्दानगी को उकसाया नहीं
कुछ महीने पहले पीड़िता नहीं हो सकती थी?
साली, छोटी जात! TRP का हिसाब  समझ नहीं आया?
बेशर्म! पूछती है, "निर्भया को न्याय तो मुझे क्यों नहीं?'

लेफ्ट लिबरल पोस्टमॉडर्न पोस्टस्ट्रक्टुरल कम्युनिस्ट कामरेड्स
बड़ी बड़ी भीषण शब्दावली की क्रांति से लैस छोटे छोटे कमेंटी कुनबों में
लगातार यहाँ वहां सर्वहारा का संघर्ष  ढूंढ रहे हैं.

घटना  के बाद एसिड से जलाये गए अंगों की गंध
संगीता की चीख
रानी की विच्छिन्न हुई देह
लीला  का चुक चुका धैर्य
कांति का लगभग मर चुका आत्मविश्वास -
गंगा मैया की घाट पर 24सों घंटे बिजली के पंखे में सोये राइट के  
'अच्छे दिन' के अच्छे सपनो की गहरी नींद नहीं तोड़ पाते

इंडियन मार्क्स मलाना क्रीम की मलाईदार सांस में
व्हिस्की के विहंसते जाम में
मार्लबोरो और लॉन्गबीच की लम्बी कश से खिंची लम्बी बहस में
हर रोज़ साम्यवाद की लाल शाम ढूंढ रहा है.

और यहां संगीता, लीला, रानी, कांति और न जाने कौन कौन
हर मिनट हर सेकंड
घर की दहलीज़ के अंदर
चौखट के बाहर
ऑफिस के चैंबर्स  के बीच
लिफ्ट में
बस में
ट्रेन में
कैब में
बाजार में
एकांत में
भीड़ में
चाऊमीन खाये पगलाए लड़कों को
तरह तरह से उकसा  रही है 

Friday, April 4, 2014

भीतरगांव

जीवन, सत्य और प्रेम के बीच पसरी एक अंतहीन खाई.. कभी कभी ऐसा लगा जैसे सफ़ेद धुले आसमान के नीचे, हिम श्रृंखला के ऊपर से, सूरज की अंतिम किरणों को चूमते बस कूद जाये - मौत से जंग लड़ने। पर बार बार कुछ छूटे कर्तव्य, कुछ रीते नयन, कुछ बचे हिसाब जैसे हर बार रोक लेते हों. जीजिविषा अलग चीज़ होती है. जीने की कला बिलकुल अलग. शायद दर्शन के इस अंतहीन अंतर्कलह के मध्य फंस गया था न निगलने न उगल पाने वाला वो निवाला। 



परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है - यह बात समझती भी थी, जानती भी, अपनाती भी थी. पर परिवर्तन के इस व्यावहारिक परावर्तन को तमाम ज़िंदगियों में उतरता देखकर थोड़ी विस्मित थी.



रीना ने भीतरगांव के उस दलित कस्बे में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। शायद इसलिए कि कहीं और के छूटे कर्त्तव्य का निर्वहन वहाँ करके अपने आप को अपराधबोध से मुक्त कर सके. पर क्या मुक्ति सम्भव है? सब कुछ करने, महसूसने, टूटने और बिखरकर खुद को समेटने के बाद क्या कोई कभी भी मुक्त हो सकता है?



दोपहर में धूप से नहायी शैल श्रृंखला को उनींदी आखों से देखते हुए रीना ने चट्टान पर लेटे लेटे लगभग पूरे वृत्तांत को क्रमशः उलटते पलटते देखा? क्या हर बार हर सफलता की वजह परिस्थितियां और हर विफलता का कारण वही थी? क्या विश्वास करना अपने आप में एक विश्वासघात था? क्यूंकि हर विश्वास के पीछे खुद को छोडकर कहीं और अपने अस्तित्व को ढूंढना स्वयं के साथ विश्वासघात ही तो है?



कल शाम को गाँव की एक लड़की का बलात्कार हुआ. स्थानीय विधायक ने यह दुष्कर्म किया यह कह कर कि बलत्कृत युवती से विवाह कर वह उसे रानी बनाएगा और स्वयं को उसका रक्षक, औरों के लिए परमेश्वर और प्रदेश के लिए राजा। काश ज़िन्दगी केवल स्वयम्भूत समीकरणों पर चलती। काश! लोग - खासकर औरतें - केवल मांस का लोथड़ा और भावनाओं की पुलिया होतीं जिसे जब चाहे फाटक खोल कर आजाद करो और जब चाहे बंद करके दम घोंट दो. और हर बार इसी अपेक्षा के साथ कि परम पवित्र, पतिव्रता नारी का ममत्व स्वयं को त्याग कर अपना सर्वस्व उस जानवर को सौप दे! बलत्कृत युवती ने विवाह के दिन मंडप में ही खुद को आग लगा ली. स्थानीय मीडिया ने मामला खूब उछाला। पर हुआ क्या? जीता कौन? वही विधायक! आखिर वोटों की, समर्थन की राजनीति खेली थी. बेचारगी की हालत में, जनता के बहुमतों से गरीबों, दलितों और भीतरगांव का वह मसीहा जीत गया. उसकी शादी अंततः दिल्ली के एक मालदार विधायक की मालदार बेटी से हो गयी.

Friday, March 14, 2014

परित्यक्त ख़ामोशी

मेरे जाने के बाद अगर एक चीख भर भी बच जाए 
तो शायद बहुत कुछ कह गयी मैं. 

मेरे जाने के बाद अगर ये टीस भी दे जाए 
तो शायद बहुत कुछ कर गयी मैं.

मेरे रहते अगर कभी कभार ही सही एक विध्वंस होता सा दिखे
तो शायद नयी परिभाषाएं गढ़ गयी मैं.

मेरे रहते अगर ज़रा सा भी चैन कभी मिलता सा लगे
तो ज़रा सा ही सही ज़ायका ज़िन्दगी में भर गयी मैं.

Darts and quivers

I feel with every sunrise the texture of you
slowly being washed away 
from familiar streets and staircases. 

I scattered my soul 
to the drunken air 
above the sun beaten earth.
And quivering knees 
beaten and infected with hesitation 
slowly leaving footprints 
deepened by the weight of shame 

Love has shriveled its way
quietly and naturally to death.
From the precincts of cheap apartments and hotel rooms 
escape heavy air of heavier heaves. 

Everything seems drowned in that one gasp 
the one with together - with each other. 

Perhaps there was a purpose somewhere 
tucked between shared meals or beds 
Nesting between embraces, arguments and kisses. 

I hear and feel nothing. 

Warm tears wetting my cheeks, neck
entangled in my scattered hair - now lost. 

Only a sense of numbness 
etched beautifully into my skin 
deepened and deepening by the age of time - 
unravaged and uncaptured by memory.

Tuesday, February 11, 2014

In defense of 'dry'ness, your highness!

It's a dry spring....

Of wilted dreams, wizened ideas
Parched ambitions, scorched desires...
Dry lips lisping the drier notes of Dryden's humour
Shrivelled souls in the driest month of the year.

Baked kiln and salty deserts
in dry months of dessicated minutes
Torried and burned and dehydrated...dry dry dry times!

It's a dry spring
reminiscent of drier autumns
just gone by...

Of a dry year
of dry ambitions.....
of still drier, shrivelled verbs -
defying and defining dry actions.

It's a dry month and a dry season -
nursed by dry thoughts of dry ambitions.