Friday, October 25, 2013

यूँ ही

"तुम्हारे प्रेम में चिंता से कहीं अधिक व्याकरण दोष है. न न.…ये मत समझना मैंने रुमाल अपने होठों पर इसलिए रखा कि मैं हँस रही थी. मैं तो बस तुम्हारी कमजोरियां भांप रही थी - और तुम बड़े तेज़ निकले।" 

कहते हैं प्यार का टाइटैनिक जहाज है उसका वह डब्बा। लोरेअल का अध्-बचा लिप ग्लॉस, साथ खाए-बचाए चॉकलेट का तुड़ा - मुड़ा रैपर, 'उसकी' दी हुई एक क्लिप और शायद बर्फीले समुद्र से लाया एक पत्थर। 

"तुम्हारा हर बरस मुझसे मिलने आना किसी प्रेम परंपरा का निर्वाह करना नहीं है. तुम्हारा आना मुझमे तुम्हारा बचा रहना है. और मेरे बचे रहने के लिए भी तो जरूरी है तुम्हारा यूँ ही आते रहना।"

कायदे से आदतों के वो दीमक दराज़ में बंद होने चाहिए थे. और यादों की सुर्खियाँ आवारा कल्पनाओं की आलमारी पे पड़ी होनी चाहिए थी. पिरोना चाहिए था इन सभी बिखरे अवशेषों को, शब्दों के धागों में. मूंगफली के सूखे छिलके, चिप्स के पैकेट, धूल की तह के नीचे आधी पढ़ी, पन्ने मुड़ी किताब. ओह! कितना सुखद रहा होगा वो क्षण।

शायद मौन के सफ़ेद तालाब के बीच लिखेगी वह एक कविता, या पूरी करेगी वो चिट्ठी - उस शेष के लिए जो बचा है उन दोनों के बीच.

1 comment:

  1. वा... वा... बहुत खूब... तुम्हारा हर बरस मुझसे मिलणा.... बहुत बहुत खूब

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