Friday, May 27, 2016

माया तुम बदली नहीं

नदियों और ऋचाओं की बातें छोड़ो न। बस अब थोड़े ही देर में सब रुखसत हो जायेगा। तुम भी तो छोड़ जाओगी मुझे। कैसे रहूंगी तुम्हारे बिना। तुम्हारे साथ बिताये ये एक महीने, मेरी ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत पल थे। अरे रुको न, हाँ बालों को ऐसे ही खुला छोड़ दो, रात को शैम्पू कर लेना, डीप कंडीशन भी कर लेना, एक एक रेशा सुलझ जाएगा। वैसे भी तुम कभी कंघी तो करती नहीं। बस जी लो यहाँ मेरे साथ। और हाँ, देखो न भूल गयी कहना। ओवर एनालाइज न करो। लीन स्ट्रीट पर घंटों चलना, ईस्ट ब्रॉड स्ट्रीट पे बस यूँ ही मुड़ कर चलते जाना। हील्स पहनने की आदत नहीं थी तुम्हारी। और उसने कहा था हमेशा चप्पल बैग में अख़बार के फोल्ड्स बीच रख कर चलना। उन्हें निकालती, हील्स को वापस बैग में डालती, बैग को झोले की तरह या तो कंधे पे हाथ के सहारे पीठ पर झुलाती चलती या पापा जैसे सब्जी लेकर आते थे वैसे लेकर चलती। ओह, कितना अच्छा था सिर्फ तुम्हारे साथ बातें करना। तुम बदल क्यों गयी, माया? इतनी चुप क्यों हो गयी? बदली या पता नहीं चला कि बदल गयी। खैर, वैसी ही हो। बस चुप हो थोड़ा। शायद शांत हो गयी हो। न न, दरअसल अकेली लग रही हो मुझे, अकेली हो गयी हो। सब कुछ है, पर अंदर से सूख गयी हो, क्लांत हो, सूनी हो गयी हो तुम। क्यों माया? और अगर हो भी, तो मैं क्यों सहूँ? तुम्हें मैंने तो नहीं छोड़ा! मैं तो चार साल पहले भी साथ थी, आज भी हूँ। पर तुम मुझसे तक रूठ गयी? चलो जेनीज़ से आइस क्रीम खाते हैं! 'एक डार्क चॉकलेट और एक लेमन बटरमिल्क का स्कूप दे दीजिये भइया' उसके चेहरे पर असमंजस का भाव देखकर हंस पड़ी थी तुम। कितनी प्यारी लग रही थी। कॉरपोरेट जैसे बंधे सधे बाल, कपड़ों पर एक भी क्रीज़ नहीं, और हंस पड़ी। उस वेश भूषा में इतनी तेज़ हंसी माया कि तुमने स्कूल जाने वाले बच्चों को भी मात दे दी। फिर सँभालते हुए, फोन से नज़रें हटाकर, फ़ोन को पर्स में डालकर कहा, "मे आए हैव अ स्कूप ऑफ़ डार्क चॉकलेट एंड वन लेमन बटरमिल्क, प्लीज" ऐसी मुस्कुराहट, माशा अल्लाह! उस लड़के ने काउंटर के पीछे से कंधे उचकाकर कहा, "श्योर!" और फिर हाथ में कार्ड, बिल, आइसक्रीम, चमच्च और टिश्यू पकड़ाते हुए कहा, "यू हैव डार्क, मिस्ट्रीयसली ब्राउन, ब्यूटीफुल आईज" कैसे अवाक् हो गयी थी तुम! यार माया, यू एस है! यहाँ कोई भाग कर पीछा नहीं करेगा तुम्हारा। और वो क्यूट भी हुआ न तो भी लाइन नहीं मार रहा। कैज़ुअल हैं यहाँ सब। "इंडियन आईज आर ब्यूटीफुल, मैकी। वेल, थैंक यू फॉर द आइसक्रीम एंड विल थैंक माय पेरेंट्स फॉर द जीन्स।" अरे यार माया, क्या बोला तुमने यार! मैं तो चौंक गयी तुम्हे देखकर। चुप हो गयी हो, पर कॉन्फिडेंट और भी हो गयी हो यार। क्या हुआ इतने दिनों में? कॉलेज में तो इत्ते से कॉम्प्लीमेंट में खुद की, दोस्तों की नींद ख़राब कर देती थी ये पूछ पूछ कर कि "मुझसे कोई गलती हुई क्या? कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं अनजाने में 'कम हिट ऑन मी' वाले सिग्नल्स देती हूँ? बदल गयी हो माया। पर अच्छा है। पहले वाली दोस्त को मिस किया मैंने तुमसे मिलकर, पर अच्छा लगा। तुम अब खुलकर हंसती नहीं, केवल काम में मशगूल रहती हो। हमेशा कुछ न कुछ नया करती रहती हो। क्यों माया? इसलिए कि अकेली हो गयी हो? घर के कोलाहल की जगह काम में कोलाहल ढूंढती हो? खुश हो न? तुम अब समय पर खाती नहीं, केवल दिन में दो बार कुछ कुछ पेट में डाल लेती हो। इसलिए न कि कोई पूछता नहीं कि क्या खाया? क्या बनाया? कि घर से कोई कॉल आना बंद हो गया। वो पूछता है, फिर भी नहीं खाती माया! कितना कहकर भेजा था कि ये वो फलां योगर्ट ट्राए करना वगैरह वगैरह पर तुमने केवल एक महीने दुःख में, काम में गुजार दिए माया। तुम्हारा घर भी तो हो जायेगा न वो माया। क्यों सोचती हो इतना। खैर, अब मैं एनालाइज करने लग गयी। सुनो, तुम बहुत बहुत अच्छी हो! किसी के नाजायज़ नाराज़ होने पे शकल न बनाओ। किसी का दिल नहीं दुखाया तुमने, किसी से कोई शिकायत नहीं की। अपनी बदौलत, अपनी मेहनत और अपने संघर्ष से अपने फैसले लिए। तो दुखी मत हो। लीन स्ट्रीट के बाद, वेस्टमिनिस्टर घूमना, अल्बेमरले स्ट्रीट घूमना। और घूमना और और खूब काम करना। तुम्हारा काम तुम्हारी पहचान है। तुम्हारी लेखनी तुम्हारे घर का वरदान - वो जोड़े रखेगी तुम्हे उन सबसे जो रूठ गए हैं। और तुम शांत नहीं हुई, माया, तुमने अपनी सारी चुलबुलाहट, सारी ऊर्जा, सारा सारांश अपने भीतर जज़्ब कर लिया है। तुम बदली नहीं, तुम्हारी दुनिया तुमसे अपनी शांति न पाकर बदल गयी है। वो खुश है। उसे कोई और माया मिल जायेगी। मिल ही गयी है। तुम हील्स उतार कर, बैग हाथ में लेकर, कॉफ़ी या चॉकलेट आइसक्रीम लेकर खूब चलो। कॉफ़ी हॉउस के बाहर बैठ कर खूब लिखो और घर जाकर खूब काम करो।

1 comment:

  1. माया हर उस आस की याद दिलाती है जो कभी ज़िन्दगी से लबरेज़ थी और फिर प्रगमाटिक स्टीपल-चेस से होती हुई खो सी गयी. क्या कहानी को अलग वक़्त पे पढो तो उसकी तासीर अलग महसूस होती है? या तासीर बदलती नहीं मुह का स्वाद बदलता है? खैर, अभी पढ़ा तो माया एक ग्लास के मेम्ब्रेन के पीछे ख़डी दिखाई दी.
    उसे देख के ऐसा लग रहा है उसकी पुरानी कल के लिए सपने देखने की आदत छूट गयी है और आज के लिए जीने की जिद प्रबल हो गयी है.
    कई बार वो ऐसा सोचती होगी की ये आज में जीने वाला इंसान कौन है, जो मेरे अन्दर दौड़ लगा रहा है? मैने तो कभी ऐसी चीज़ें सोची ही नही.
    मदमस्त मेरी चाल थी, बोली में कोई परहेज़ नहीं और न समय की कोई पाबन्दी.
    मैं, जो छोटी-छोटी बातों पर उछल जाती थी, नरक-स्वर्ग के अंतर को टटोलती थी, पाप-पुण्य का हिसाब रखती थी. अब जब 'आज' ही की रेस है तो ये सब कुछ ध्यान में नहीं आता. सब ओक्सिजेन की तरह है, ले रहे है और पता भी नहीं चल रहा है.
    क्या वो ये सोचती है की वैसी वाली सांस फिर कब आएगी? या नहीं ही सोचती?
    माया ग्लास सीलिंग के उस पार कैद हो गयी है.सर ग्लास सेलिंग के उस पार और टांगें फिर भी नीचे धरातल को छूने की कोशिश कर रही है. ऐसी स्तिथि में ज्यादा देर तक रहें तो शरीर सुन्न हो जाता है. लेकिन क्या बात किसी को समझ आ रही है? शायद बस माया को.वो खुद से कह रही है:-
    लेखनी ही तुम्हारा क्थार्सिस है माया. बस यही सच है,सम्पूर्ण सच.
    बस लिखो माया खूब लिखो.

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